नई दिल्ली में आयुष मंत्रालय ने वृश्चिकासन को एक उन्नत योग आसन बताया है, जो शरीर और मन दोनों को चुनौती देता है। इस आसन के नियमित अभ्यास से शरीर में लचीलापन, शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है।
मुख्य तथ्य
- वृश्चिकासन का अर्थ है बिच्छू की मुद्रा, जिसमें शरीर की आकृति बिच्छू जैसी होती है।
- आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह आसन हाथ, कोहनियाँ, कंधे, कोर और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत करता है।
- सही अभ्यास से मस्तिष्क में रक्त संचार बेहतर होता है, जिससे स्मरण शक्ति और फोकस बढ़ता है।
- गर्भवती महिलाओं और मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को यह आसन नहीं करना चाहिए।
- कलाई, कंधे, गर्दन या पीठ में गंभीर चोट या स्लिप्ड डिस्क वालों को यह करने से बचना चाहिए।
वृश्चिकासन का महत्व और लाभ
वृश्चिकासन शरीर की वह मुद्रा है, जो बिच्छू के आकार से मिलती-जुलती है। इस आसन में सिर के बल खड़े होकर पैर पीठ की ओर मोड़े जाते हैं, जो शरीर को मजबूती और संतुलन प्रदान करता है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह आसन हाथों, कोहनियों, कंधों, पेट और पीठ की मांसपेशियों को सुदृढ़ करता है।
इसके नियमित अभ्यास से शरीर में लचीलापन आता है और आत्मविश्वास बढ़ता है। साथ ही मस्तिष्क में रक्त संचार सुधरने से स्मरण शक्ति और ध्यान की क्षमता बेहतर होती है। तनाव में कमी आती है और हृदय के लिए भी यह लाभकारी रहता है क्योंकि रक्त प्रवाह संतुलित होता है।
आसन करते समय सावधानियां
यह आसन कठिन होता है और इसे तभी करना चाहिए जब कोई पिंचा मयूरासन में निपुण हो। शुरुआत में योग शिक्षक की देखरेख में या दीवार के सहारे ही अभ्यास करना चाहिए। गर्भवती महिलाएं और मासिक धर्म के दौरान महिलाएं इसे न करें।
अगर किसी व्यक्ति को कलाई, कंधे, गर्दन या पीठ की गंभीर चोट या स्लिप्ड डिस्क की समस्या है, तो इस आसन का अभ्यास न करें। संतुलन बनाए रखने के लिए शरीर पर पूरा ध्यान देना जरूरी है, जिससे मन की सतर्कता भी बढ़ती है।
स्रोत: deshbandhu.co.in


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