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भारत में BPaL थेरेपी पर पेटेंट नहीं, भारतीय कंपनियों के लिए दवा उत्पादन का रास्ता खुला

भारत में TB Alliance के BPaL थेरेपी पेटेंट आवेदन को खारिज कर दिया गया, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए दवा उत्पादन का रास्ता खुला।

भारत में BPaL थेरेपी पर पेटेंट नहीं, भारतीय कंपनियों के लिए दवा उत्पादन का रास्ता खुला

27 अक्टूबर को भारतीय पेटेंट ऑफिस ने ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (DR-TB) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली BPaL थेरेपी पर अमेरिकी संस्था TB Alliance के पेटेंट आवेदन को खारिज कर दिया। इस फैसले से इस दवा के फिक्स्ड कॉम्बिनेशन पर किसी एक संस्था का एकाधिकार नहीं होगा और भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियों के लिए उत्पादन का रास्ता खुल सकता है।

BPaL थेरेपी क्या है?

BPaL थेरेपी तीन दवाओं—बेडाक्विलिन, प्रेटोमैनिड और लाइनज़ोलिड—का संयोजन है, जिसका उपयोग ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के मरीजों के इलाज में किया जाता है। इस थेरेपी में करीब छह महीने तक दवाएं लेनी पड़ती हैं। भारत के राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में BPaLM नामक एक और योजना भी है, जिसमें इन तीन दवाओं के साथ मोक्सीफ्लोक्सासिन भी शामिल है। डॉक्टर मरीज की जांच के बाद तय करते हैं कि कौन-सी दवा योजना उपयुक्त होगी।

पेटेंट आवेदन और उसका खारिज होना

TB Alliance ने भारत में इन तीन दवाओं के फिक्स्ड-डोज कॉम्बिनेशन और उसके उपयोग के लिए पेटेंट आवेदन किया था, ताकि दवाएं एक साथ निर्धारित मात्रा में उपलब्ध कराई जा सकें। लेकिन मरीजों के अधिकारों और सस्ती दवाओं के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस आवेदन का विरोध किया, क्योंकि यह तीनों दवाएं पहले से जानी-पहचानी हैं और सिर्फ इन्हें मिलाने को नया आविष्कार नहीं माना जा सकता।

पेटेंट कार्यालय ने 27 अक्टूबर को आवेदन खारिज कर दिया क्योंकि इस कॉम्बिनेशन में कोई नया आविष्कार साबित नहीं हुआ और आवेदन में जरूरी जानकारी भी पर्याप्त नहीं थी।

भारत ने पेटेंट क्यों नहीं दिया?

भारत के पेटेंट कानून की धारा 3(d) के अनुसार, किसी पुरानी दवा में मामूली बदलाव करके उसे नई दवा बताकर पेटेंट नहीं दिया जाता। इसे एवरग्रीनिंग कहते हैं। साथ ही, इस मामले में अन्य कानूनी वजहों से भी आवेदन खारिज हुआ।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरक्लोसिस एंड रेस्पिरेट्री डिजीज के पूर्व निदेशक डॉ. रवीन्द्र कुमार दीवान ने बताया कि भारत की दवा नीति मरीजों को गंभीर बीमारियों की दवाएं कम कीमत पर उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। इसलिए पेटेंट आवेदन खारिज करना इस नीति के अनुरूप है।

मरीज़ों को क्या फायदा होगा?

डॉ. दीवान के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के मरीजों को जरूरी दवाएं मुफ्त दी जाती हैं। नई इलाज योजना पर सरकार का खर्च लगभग 40 हजार रुपये प्रति मरीज है। हालांकि, नई दवाओं की सप्लाई में कुछ दिक्कतें आ सकती हैं, लेकिन मरीजों को मुफ्त इलाज मिलता रहेगा।

पेटेंट खारिज होने के बाद यह अभी तय नहीं है कि फिक्स्ड-डोज कॉम्बिनेशन की कीमत में कितनी कमी आएगी या भारतीय कंपनियों की जेनेरिक दवाओं की कीमतें क्या होंगी। डॉ. दीवान का मानना है कि अगले छह महीने से एक साल के भीतर विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं, पर यह जरूरी मंजूरियों और सप्लाई पर निर्भर करेगा।

आगे क्या होगा?

TB Alliance को इस आवेदन के आधार पर BPaL कॉम्बिनेशन पर विशेष अधिकार नहीं मिलेंगे। इससे अन्य कंपनियों के लिए आवश्यक गुणवत्ता मानकों और नियामकीय मंजूरी के तहत दवा निर्माण की संभावना बढ़ जाएगी।

हालांकि पेटेंट खारिज होना दवा बनाने या बेचने की मंजूरी नहीं है। कंपनियों को गाइडलाइन और नियमों का पालन करना होगा। सरकार की खरीद और सप्लाई मैनेजमेंट भी अहम भूमिका निभाएगा। यह फैसला सस्ती दवाओं के विकल्प बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

स्रोत: tv9hindi.com

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