जयपुर में डॉक्टर रोहित शर्मा, सीनियर कंसलटेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल ने बताया कि थायराइड की जांच में मुख्य रूप से टीएसएच (थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन), टी3 और टी4 हार्मोन के स्तर पर ध्यान दिया जाता है। थायराइड ग्रंथि ठीक से काम न करने पर इन हार्मोनों का स्तर बदलता है, जो थायराइड की समस्या का संकेत देता है।
थायराइड हार्मोन स्तर और उनकी भूमिका
टीएसएच मस्तिष्क की पिट्यूटरी ग्रंथि से निकलता है और थायराइड को हार्मोन बनाने का संदेश देता है। यदि रिपोर्ट में टीएसएच का स्तर बढ़ा हुआ और टी4 कम हो, तो यह हाइपोथायराइडिज्म यानी थायराइड कम सक्रिय होने का संकेत हो सकता है। इस स्थिति में मरीज को थकान, वजन बढ़ना, ठंड लगना, कब्ज और बाल झड़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
इसके विपरीत, यदि टीएसएच कम और टी3 या टी4 बढ़ा हो, तो यह हाइपरथायराइडिज्म यानी थायराइड अधिक सक्रिय होने का संकेत देता है। इस स्थिति में वजन कम होना, दिल की धड़कन तेज होना, घबराहट, पसीना अधिक आना और नींद न आना जैसी परेशानियां हो सकती हैं।
रिपोर्ट के परिणामों की व्याख्या और सावधानियां
डॉक्टर रोहित शर्मा के अनुसार, केवल एक रिपोर्ट के आधार पर थायराइड की बीमारी का निश्चित निदान नहीं किया जा सकता। कभी-कभी टीएसएच में मामूली बदलाव होते हैं जबकि टी3 और टी4 सामान्य रहते हैं। ऐसे मामलों में मरीज की उम्र, लक्षण और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर दोबारा जांच की सलाह दी जाती है।
गर्भावस्था, कुछ दवाओं और अन्य बीमारियों के कारण भी थायराइड हार्मोन का स्तर प्रभावित हो सकता है। इसलिए रिपोर्ट में हार्मोन स्तर सामान्य सीमा से कम या ज्यादा होने पर घबराना नहीं चाहिए, बल्कि डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है। बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा शुरू करना, खुराक बदलना या बंद करना नुकसानदायक हो सकता है।
समय पर जांच और उचित इलाज की आवश्यकता
थायराइड की समस्या को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए समय पर जांच और सही इलाज जरूरी है। डॉक्टर रोहित शर्मा ने कहा कि सही निदान और उपचार से थायराइड से जुड़ी समस्याओं को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है।
स्रोत: tv9hindi.com


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