रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए एक नई शर्त रखी है, जिसने अमेरिका और यूरोप में हलचल मचा दी है। पुतिन की यह शर्त नाटो के पूर्वी विस्तार को सीमित करने की मांग करती है, जिससे यूरोप के कई देश खतरे में आ सकते हैं।
पुतिन की सीजफायर की शर्त क्या है?
पुतिन यूक्रेन में सीजफायर के बदले नाटो को अपनी 1997 की सैन्य स्थिति में वापस लौटाने की मांग कर रहे हैं। इसका मतलब है कि नाटो को 1997 के बाद शामिल हुए 15 से ज्यादा देशों से अपनी सैन्य ताकत वापस लेनी होगी। इसमें पोलैंड, फिनलैंड, बाल्टिक देश जैसे सदस्य शामिल हैं। पुतिन का मकसद यूरोपीय सुरक्षा ढांचे को अपने पक्ष में बदलना और नाटो की सैन्य उपस्थिति को कम करना है।
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, पुतिन ट्रंप के रुख को देखते हुए इस समझौते को केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं रखना चाहते। वे शांति वार्ता का इस्तेमाल नाटो के विस्तार को सीमित करने के लिए कर रहे हैं।
नाटो और यूरोप पर पुतिन के दांव का असर
रूस की यह मांग नाटो के उन देशों में खलबली मचा गई है, जो 1997 के बाद गठबंधन में शामिल हुए हैं। यह स्थिति खासतौर पर यूरोप के पूर्वी हिस्से और ईस्टर्न फ्लैंक के लिए गंभीर सुरक्षा संकट पैदा कर सकती है। यदि नाटो अपनी 1997 की स्थिति में लौटता है, तो यह क्षेत्र पूरी तरह असुरक्षित हो जाएगा और रूस इन देशों पर सैन्य कार्रवाई कर सकता है।
इससे नाटो के आर्टिकल 5 की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे और रूस के क्षेत्रीय विस्तार की इच्छा बढ़ेगी। पुतिन की यह चाल सिर्फ सैन्य विस्तार को सीमित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत भी चाहते हैं ताकि रूस की वित्तीय स्थिति सुधर सके।
जर्मनी की तैयारी और रूस के हाइब्रिड हमले
जर्मनी ने रूस के इस खतरे को समझते हुए अपनी स्पेशल फोर्स KSK कमांडो की ट्रेनिंग में बदलाव किया है। अब सैनिकों को लंबे समय तक फील्ड में लड़ने की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके अलावा टैंक, आर्टिलरी, ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों से मुकाबले का अभ्यास भी किया जा रहा है।
रूस के गुप्त हाइब्रिड हमलों का खतरा भी पूरे यूरोप में बढ़ रहा है। अमेरिका और यूरोप इस दबाव का सामना करने के लिए रणनीति बना रहे हैं क्योंकि नाटो अपने पूर्वी मोर्चे को कमजोर करना नहीं चाहता।
आगामी वार्ताएं और भविष्य
रूस और अमेरिका के बीच तकनीकी स्तर पर त्रिपक्षीय वार्ता का अगला दौर नवंबर में होने वाला है। यह बैठक तय करेगी कि क्या कूटनीतिक रास्ते से कोई समझौता संभव है या यूरोप में टकराव और गहरा होगा।
पुतिन का यह एंटी-नाटो दांव केवल रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने का प्रयास नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा ढांचे को अपने पक्ष में मोड़ने का बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
मुख्य तथ्य
- पुतिन ने नाटो के पूर्वी विस्तार को 1997 के स्तर पर वापस लाने की शर्त रखी है।
- यह शर्त यूरोप के ईस्टर्न फ्लैंक के लिए गंभीर सुरक्षा खतरा पैदा कर सकती है।
- जर्मनी ने रूस के संभावित सैन्य खतरे के लिए अपनी सेना की तैयारी तेज कर दी है।
- अमेरिका और यूरोप रूस के दबाव का मुकाबला करने की रणनीति बना रहे हैं।
- नवंबर में रूस-अमेरिका के बीच त्रिपक्षीय वार्ता का अगला दौर होगा।
स्रोत: tv9hindi.com


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