पूर्वी भूमध्य सागर में तुर्की और लीबिया के बीच हुए समुद्री सीमाओं के समझौते को लेकर कई देशों में विरोध और तनाव बढ़ गया है। ग्रीस, मिस्र, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने इस समझौते की आलोचना की है, जबकि तुर्की ने इसे सही ठहराया है। यह विवाद समुद्री अधिकारों, तेल-गैस संसाधनों और क्षेत्रीय रणनीति से जुड़ा हुआ है।
तुर्की-लीबिया के बीच समझौते का मकसद
2019 में तुर्की और लीबिया के बीच पूर्वी भूमध्य सागर में समुद्री सीमाओं को लेकर एक समझौता हुआ था। उस समय लीबिया की राजधानी त्रिपोली की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार ने इसे मंजूरी दी थी। हाल ही में लीबिया की पूर्वी संसद ने भी इसे स्वीकार किया है।
इस समझौते का लक्ष्य दोनों देशों के बीच समुद्री क्षेत्र की सीमा तय करना है ताकि तुर्की और लीबिया वहां मछली पकड़ने, प्राकृतिक संसाधनों की खोज और तेल-गैस से जुड़ी गतिविधियों के अधिकार प्राप्त कर सकें। तुर्की अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वहीं लीबिया भूमध्य सागर के दक्षिणी तट पर स्थित है।
यह समझौता तुर्की को इस क्षेत्र में अपनी समुद्री शक्ति बढ़ाने और तेल-गैस खोज में रणनीतिक बढ़त दिलाने की कोशिश है। हालांकि ग्रीस और साइप्रस इस समझौते को अपने अधिकारों के खिलाफ मानते हैं और इसका विरोध करते हैं।
समझौते का विरोध कौन कर रहा है?
इस समझौते का मुख्य विरोध ग्रीस कर रहा है। इसके अलावा साइप्रस, मिस्र, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने भी आपत्ति जताई है। इन देशों की चिंता समुद्री अधिकारों, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़ी है।
ग्रीस: ग्रीस का मानना है कि तुर्की-लीबिया समझौता उसके समुद्री अधिकारों को प्रभावित करता है। ग्रीस के कई द्वीप पूर्वी भूमध्य सागर में हैं जिनमें क्रेते द्वीप भी शामिल है। तुर्की-लीबिया सीमा तय करने से ग्रीस के इन द्वीपों के अधिकारों पर असर पड़ता है।
साइप्रस: साइप्रस को डर है कि यह समझौता समुद्री सीमाओं पर पहले से मौजूद विवादों को और बढ़ा सकता है, खासकर गैस के भंडार और ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर।
मिस्र: मिस्र के लिए यह विवाद समुद्री अधिकारों के साथ-साथ क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा हितों का भी है। मिस्र इस क्षेत्र में गैस उत्पादन और ऊर्जा कारोबार का केंद्र बनना चाहता है।
बहरीन और UAE: इन दोनों देशों ने भी ग्रीस के साथ मिलकर इस समझौते की आलोचना की है। उनका कहना है कि समुद्री विवादों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हल किया जाना चाहिए, न कि केवल दो देशों के बीच समझौते से दूसरों के अधिकार प्रभावित हों।
विरोध के पीछे की मुख्य वजहें
इस विवाद के तीन मुख्य कारण हैं। पहला, समुद्री सीमाओं पर अधिकार का टकराव। दूसरा, पूर्वी भूमध्य सागर में मौजूद तेल और गैस के संसाधन। तीसरा, तुर्की और ग्रीस के बीच लंबे समय से चला आ रहा रणनीतिक टकराव।
अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत तटीय देशों को समुद्र के कुछ हिस्सों पर विशेष अधिकार मिलते हैं, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों की खोज शामिल है। लेकिन जब दो देशों के अधिकार टकराते हैं, तो सीमा तय करना मुश्किल हो जाता है। ग्रीस का कहना है कि उसके द्वीपों को भी समुद्री अधिकार मिलना चाहिए, जबकि तुर्की इन दावों को चुनौती देता है।
पूर्वी भूमध्य सागर में गैस के भंडार और उनकी खोज आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। समुद्री सीमा तय करने से यह पता चलता है कि कौन-सा देश किन संसाधनों का उपयोग कर सकता है। ग्रीस ने क्रेते के पास गैस खोज के लिए एक कंसोर्टियम को लाइसेंस दिया है और वह लीबिया के साथ भी सीमा तय करने की कोशिश कर रहा है।
अगर समुद्री क्षेत्रों पर कई देशों के दावे होते हैं, तो तेल-गैस की खोज और निवेश कानूनी और कूटनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कंपनियों को चिंता रहती है कि विवादित क्षेत्र में निवेश पर भविष्य में प्रोजेक्ट प्रभावित हो सकते हैं।
तुर्की और ग्रीस का रणनीतिक टकराव
तुर्की और ग्रीस दोनों नाटो सदस्य हैं, लेकिन समुद्री सीमाओं, हवाई क्षेत्र और पूर्वी भूमध्य सागर में प्रभाव को लेकर उनके बीच विवाद लंबे समय से जारी हैं। दोनों देश अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों की रक्षा करना चाहते हैं।
तुर्की के लिए लीबिया के साथ समझौता इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने का जरिया है, जबकि ग्रीस इसे अपनी समुद्री अधिकारों के लिए चुनौती मानता है। अगर इस समझौते को क्षेत्र में समर्थन मिलता है, तो तुर्की की स्थिति भविष्य में मजबूत हो सकती है।
लीबिया की राजनीतिक स्थिति
लीबिया में लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता है। 2011 में मुअम्मर गद्दाफी के सत्ता से हटने के बाद देश गृहयुद्ध और राजनीतिक संघर्ष में रहा। पश्चिमी और पूर्वी सत्ता केंद्रों का बंटवारा बना हुआ है।
2019 में त्रिपोली की सरकार ने इस समझौते को मंजूरी दी थी, लेकिन पूर्वी प्रशासन ने इसे कई साल तक स्वीकार नहीं किया। अब पूर्वी संसद की मंजूरी से राजनीतिक स्थिति में बदलाव आया है। हालांकि, यह मंजूरी अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी देशों पर लागू होने का प्रमाण नहीं है।
पूर्वी प्रशासन के नेता खलीफा हफ़्तार और उनके सहयोगियों के तुर्की के साथ संबंधों में सुधार हुआ है, जिससे तुर्की को लीबिया के दोनों सत्ता केंद्रों के साथ संबंध मजबूत करने का मौका मिला है।
क्या क्षेत्रीय तनाव बढ़ेगा?
इस समझौते ने पूर्वी भूमध्य सागर में समुद्री अधिकारों और ऊर्जा संसाधनों को लेकर विवाद को फिर से बढ़ा दिया है। तुर्की और लीबिया अपने दावों को मजबूत करना चाहते हैं, जबकि ग्रीस, साइप्रस और उनके समर्थक देश विरोध कर रहे हैं।
अगर दोनों पक्ष बातचीत से समाधान नहीं निकाल पाए, तो कूटनीतिक तनाव बढ़ सकता है। इसका असर भविष्य की गैस परियोजनाओं, निवेश और क्षेत्रीय सहयोग पर पड़ सकता है। इसलिए इस समझौते का महत्व सिर्फ सीमा तय करना नहीं, बल्कि पूर्वी भूमध्य सागर में आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का भी है।
देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में सब-एडिटर हैं। वे राजनीति, इतिहास और साहित्य में रुचि रखते हैं। उन्होंने भारतीय जन संचार संस्थान, अमरावती से पत्रकारिता की पढ़ाई की है।


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