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दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से हार्ट अटैक का खतरा, डॉक्टर अजय फड़के ने बताया कारण

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा है, डॉक्टर अजय फड़के ने बताया कैसे AQI दिल को प्रभावित करता है।

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से हार्ट अटैक का खतरा, डॉक्टर अजय फड़के ने बताया कारण

दिल्ली एनसीआर में अक्टूबर में प्रदूषण फिर से बढ़ गया है। कई इलाकों में AQI 350 से ऊपर पहुंच चुका है, जिससे लोगों को सांस लेने में दिक्कत, गले में खराश और आंखों में जलन हो रही है। डॉक्टरों का कहना है कि बढ़ता प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों के लिए नहीं, बल्कि दिल के लिए भी खतरा बनता जा रहा है और इससे हार्ट अटैक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

प्रदूषण दिल पर कैसे असर करता है?

डॉक्टर अजय फड़के (एमडी, पैथोलॉजी और डायरेक्टर एजिलस डायग्नोस्टिक्स) ने बताया कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कण (PM2.5) फेफड़ों से होकर खून में पहुंच जाते हैं। ये कण सांस के रास्ते में सूजन पैदा करते हैं, ब्लड प्रेशर बढ़ाते हैं और खून के थक्के जमने का खतरा बढ़ाते हैं। कई रिसर्च में यह भी पाया गया है कि जब AQI का स्तर बहुत अधिक बढ़ता है, तो कुछ दिनों बाद हार्ट अटैक और स्ट्रोक के मामले बढ़ जाते हैं।

कौन लोग प्रदूषण में सबसे ज्यादा सावधानी रखें?

प्रदूषण का कोई भी स्तर पूरी तरह सुरक्षित नहीं होता। डॉक्टर के अनुसार बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, धूम्रपान करने वालों, और अस्थमा, COPD, दिल की बीमारी या डायबिटीज से पीड़ित लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए। ये लोग मीडियम AQI स्तर पर भी नुकसान का सामना कर सकते हैं और इसलिए पूरे मौसम में सतर्क रहना जरूरी है।

प्रदूषण के लक्षण क्या हैं और कब डॉक्टर से मिलें?

अगर खांसी दो से तीन सप्ताह से अधिक बनी रहे, सांस में घड़घड़ाहट हो, सांस फूलने लगे, सीने में बेचैनी हो या आराम की स्थिति में ऑक्सीजन स्तर 94 प्रतिशत से नीचे जाए, तो डॉक्टर से संपर्क करें। डॉक्टर बिना सलाह के एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड न लेने की सलाह देते हैं।

डॉक्टर क्या जांच कराने की सलाह देते हैं?

लक्षणों के आधार पर डॉक्टर CBC, CRP, इओसिनोफिल काउंट, IgE, स्पाइरोमेट्री और चेस्ट एक्स-रे कराने की सलाह दे सकते हैं। हार्ट पेशेंट्स को ECG, लिपिड प्रोफाइल, HbA1c और hs-CRP जांच भी करानी पड़ सकती है। मौसम शुरू होने से पहले बेसलाइन जांच करवा लेना और लक्षणों में बदलाव आने पर दोबारा जांच कराना जरूरी है। इससे फेफड़ों और दिल को होने वाले नुकसान को समय रहते कंट्रोल किया जा सकता है।

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी बदलाव या इलाज से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लें।

स्रोत: indiatv.in

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