इजराइल में चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजराइली सेना (IDF) के प्रमुख इयाल जामिर के बीच ईरान पर हमला करने को लेकर विवाद सामने आया है। नेतन्याहू चुनाव से पहले युद्ध का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए करना चाहते थे, लेकिन IDF चीफ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
चुनाव और राजनीतिक दबाव
इजराइल में 120 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं, जिसमें 73 लाख मतदाता मतदान कर रहे हैं। इस चुनाव में नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य का फैसला होना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू की तारीफ करते हुए कहा कि कठिन हालात में उन्होंने अच्छा नेतृत्व किया है। ट्रंप ने मतदान से 48 घंटे पहले सोशल मीडिया पर नेतन्याहू के समर्थन में पोस्ट भी किया, जिसमें ईरान के खिलाफ उनके प्रयासों की बात कही गई।
ईरान पर हमला करने की योजना और IDF चीफ का इनकार
इजराइल के चैनल 12 की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव से दो दिन पहले नेतन्याहू ने इजराइली सेना प्रमुख इयाल जामिर को ईरान पर एक गुप्त सैन्य कार्रवाई का आदेश दिया था। हालांकि, IDF चीफ ने जल्दबाजी में कदम उठाने से इनकार कर दिया और कहा कि इस मामले में गहन रणनीतिक चर्चा जरूरी है। जामिर का मानना है कि फिलहाल ईरान इजराइल के लिए कोई तात्कालिक खतरा नहीं है क्योंकि पिछले हमलों ने ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को कमजोर कर दिया है।
जामिर के अनुसार, केवल दो स्थितियों में इजराइल को तुरंत हमला करना चाहिए: जब ईरान खुद हमला करने वाला हो या जब अमेरिका का पूरा समर्थन प्राप्त हो। नेतन्याहू द्वारा इस आदेश के बाद भी औपचारिक लिखित अनुमति नहीं मिलने पर IDF ने इसे आगे नहीं बढ़ाया।
नेतन्याहू पर युद्ध को चुनावी हथियार बनाने का आरोप
नेतन्याहू और IDF चीफ के बीच यह विवाद इजराइल में बहस का विषय बन गया है। आरोप हैं कि नेतन्याहू ईरान युद्ध को चुनावी रणनीति के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि वोट हासिल कर सकें। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नेतन्याहू को इस चुनाव को हारने का डर सता रहा है, इसलिए वे ईरान खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हैं। इसी कारण से उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से चुनाव में समर्थन की अपील भी की है।
IDF चीफ के इनकार के पीछे मुख्य कारण
- आर्थिक नुकसान की संभावना, क्योंकि ईरान पर हमला होने पर वे पलटवार कर सकते हैं और लंबी जंग से अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
- अंतरराष्ट्रीय दबाव और बहिष्कार का डर, अगर युद्ध राजनीतिक हितों के लिए किया गया तो इजराइल को कूटनीतिक समर्थन में कमी हो सकती है।
- सेना की थकान, गाजा और लेबनान फ्रंट पर तीन साल से सैनिक लड़ रहे हैं।
- संसाधनों की कमी, लगातार युद्ध से गोला-बारूद की कमी हो गई है।
इतिहास में भी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के बीच युद्ध पर विवाद
यह पहली बार नहीं है जब इजराइली प्रधानमंत्री और IDF चीफ के बीच युद्ध को लेकर असहमति हुई हो। 1967 में मिस्र और अरब देशों के घेराव के दौरान सेना प्रमुख यित्ज़ाक राबिन और पीएम लेवी एशकोल के बीच रणनीति पर विवाद हुआ था। 1973 के योम किप्पूर युद्ध से पहले भी पीएम और सेना प्रमुख के बीच रिजर्व सैनिकों की तैनाती को लेकर मतभेद थे। 1993 में फिलीस्तीनी शांति समझौते के दौरान भी सेना प्रमुख एहुद बराक ने विरोध जताया था।
लेकिन नेतन्याहू के मामले में आरोप यह है कि वे युद्ध को राजनीतिक फायदा हासिल करने का माध्यम बना रहे हैं, जो चुनाव में उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है।


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