उत्तर प्रदेश की अर्चना जायसवाल ने अपने पिता के संघर्ष और अपनी मेहनत से गांवों के बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाई है। उनकी ‘शिक्षा साथी’ पहल से अब 7,650 से अधिक बच्चे और 740 से ज्यादा ग्रामीण महिलाएं लाभान्वित हो रही हैं।
पिता का संघर्ष और परिवार की आर्थिक स्थिति
अर्चना के पिता जगदीश राम ने कम उम्र में परिवार की जिम्मेदारी संभाली। आर्थिक तंगी के कारण 17 साल की उम्र में उन्हें रिक्शा चलाना पड़ा, लेकिन उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी और बाद में रेलवे में नौकरी हासिल की। परिवार वाराणसी में रहने लगा।
पिता के निधन के बाद बढ़ी चुनौतियां
अर्चना के बचपन में ही पिता का निधन हो गया। परिवार में पांच बहनें और एक भाई थे, जिससे परिवार के लिए घर चलाना और बच्चों की पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो गया। फिर भी अर्चना ने हार नहीं मानी।
BHU से शिक्षा और नया नजरिया
अर्चना ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया। वे प्रोफेसर बनना चाहती थीं, लेकिन संसाधनों और मार्गदर्शन की कमी के कारण उनका सपना पूरा नहीं हो सका। गांव लौटकर उन्होंने देखा कि बच्चों को बुनियादी सवालों के जवाब भी नहीं आते। इससे उन्हें ग्रामीण शिक्षा में सुधार की जरूरत महसूस हुई।
शिक्षा साथी: कम फीस में बेहतर शिक्षा
2022 में अर्चना ने ‘योर कोचिंग’ शुरू की, जिसे 2023 में ‘शिक्षा साथी’ के रूप में रजिस्टर कराया गया। यह पहल पहली से बारहवीं कक्षा तक के बच्चों को स्कूल के बाद पढ़ाई का अवसर देती है, जिसकी फीस 100 से 600 रुपये तक है।
विस्तार और महिलाओं को रोजगार
अब उत्तर प्रदेश के छह जिलों में शिक्षा साथी के लर्निंग सेंटर चल रहे हैं, जहां 7,650 से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं। साथ ही, 740 से ज्यादा ग्रामीण लड़कियों और महिलाओं को शिक्षक प्रशिक्षण देकर रोजगार मिला है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन रही हैं।


टिप्पणियाँ
इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।