मध्य पूर्व में तनाव फिर से बढ़ता दिख रहा है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका किसी भी वक्त ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर सकता है। पेंटागन ने 3 नवंबर के मिडटर्म चुनावों के बाद हमलों के लिए दो सैन्य ऑप्शन तैयार किए हैं। ट्रंप ने कहा है कि समझौते का दरवाजा अभी बंद नहीं हुआ है, लेकिन वे ईरान की परमाणु क्षमता रोकने के लिए कड़ा फैसला लेना चाहते हैं।
ट्रंप की चेतावनी और परमाणु डील का भविष्य
डोनाल्ड ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा कि अमेरिका "कल" ही ईरान पर हमला शुरू कर सकता है या फिर किसी मजबूत परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर कर सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका मकसद ऐसा समझौता करना है जो ईरान को हमेशा के लिए परमाणु हथियार बनाने से रोक सके। ट्रंप ने 2025 में हुए B-2 बॉम्बर स्ट्राइक का भी हवाला दिया और कहा कि अगर सैन्य दबाव कम किया गया तो ईरान फिर से अपनी परमाणु क्षमता हासिल कर लेता।
पेंटागन और सेंटकॉम के दो स्ट्राइक प्लान
यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, अमेरिका इस बार ईरान के तटीय इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के अंदरूनी सैन्य और राजनीतिक ठिकानों को भी निशाना बना सकता है। अगर इजरायली सेना भी इसमें शामिल होती है, तो हमले ईरान के ऊर्जा तंत्र, पुलिस स्टेशन और विश्वविद्यालय जैसे नागरिक ढांचे तक फैल सकते हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 3 नवंबर के मिडटर्म चुनावों के बाद सैन्य कार्रवाई की संभावना बढ़ जाएगी।
सैन्य कार्रवाई का ईरान पर प्रभाव
विशेषज्ञ यूरेशिया ग्रुप और पूर्व रक्षा अधिकारी इस बात पर संदेह जताते हैं कि बार-बार के हमलों से ईरान अपनी रणनीति बदलने वाला नहीं है। पिछले हमलों की वजह से अमेरिका के मिसाइल इंटरसेप्टर कम हुए हैं, मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ी है और वैश्विक बाजार में ईंधन की कीमतें बढ़ गई हैं। ईरानी नेतृत्व इस लड़ाई को अपनी सत्ता और अस्तित्व से जोड़कर देख रहा है, इसलिए वे अमेरिका से रियायतें लेने को तैयार नहीं हैं।
संयुक्त अमेरिकी-इजरायली हमलों की संभावनाएं
अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों ने ईरान पर नए संयुक्त हमलों की योजनाएं बनाई हैं, लेकिन अंतिम फैसला ट्रंप के हाथ में है। विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या ये नए हमले ईरान को अपना रुख बदलने पर मजबूर कर पाएंगे। पिछले सैन्य अभियानों ने ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं को नुकसान पहुंचाया है, लेकिन उसके सैन्य और राजनीतिक ढांचे को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका।


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