नई दिल्ली: अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स को संसद के दोनों सदनों में बहुमत मिलने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखी गई है। इस घटना का असर भारत के तेल आयात पर पड़ सकता है क्योंकि ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई की कीमतें बुधवार को लगभग 9 फीसदी तक गिर गईं।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट क्यों आई?
बाजार में इस गिरावट को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और ईरान से जुड़े संघर्ष पर संभावित असर के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, चुनावी नतीजों से युद्ध के खत्म होने की पुष्टि नहीं होती, लेकिन बाजार तनाव घटने की उम्मीद में प्रतिक्रिया दे रहा है। बुधवार को तेल की कीमतों में करीब 9 फीसदी की गिरावट हुई, जो गुरुवार को भी जारी रही। ब्रेंट क्रूड 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया जबकि डब्ल्यूटीआई करीब 87 डॉलर पर पहुंचा। इस सप्ताह कीमतों में लगभग 16 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
भारत के तेल आयात पर इस गिरावट का क्या प्रभाव होगा?
भारत के लिए तेल की कीमतों में गिरावट महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। कच्चा तेल भारत के प्रमुख आयातों में शामिल है और इसके दाम बढ़ने से आयात बिल, चालू खाते और घरेलू महंगाई पर दबाव बढ़ता है। तेल की कीमतों में कमी के कारण भारत को राहत मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक बचत आयात की मात्रा, डॉलर-रुपये की विनिमय दर और खरीद की कीमतों पर निर्भर करेगी।
जानकारी के अनुसार, कच्चे तेल के दाम में हर 1 डॉलर प्रति बैरल की कमी से भारत का सालाना आयात खर्च लगभग 18,000 करोड़ रुपये घट सकता है। यह एक अनुमान है और इसे निश्चित बचत नहीं माना जाना चाहिए। भारत के इंडियन क्रूड बास्केट में गिरावट का असर तभी स्पष्ट होगा जब उसके आधिकारिक मूल्य और अवधि के आंकड़े उपलब्ध हों।
इंडियन क्रूड बास्केट क्या है?
इंडियन क्रूड बास्केट भारत के द्वारा खरीदे जाने वाले कच्चे तेल की कीमतों का संदर्भ सूचकांक है। इसमें अलग-अलग ग्रेड के तेल का भारित औसत शामिल होता है। इसमें सल्फर वाले सॉर क्रूड और कम सल्फर वाले स्वीट क्रूड दोनों शामिल हैं। सॉर क्रूड में ओमान और दुबई बेंचमार्क का औसत होता है जबकि स्वीट क्रूड में दूसरे प्रमुख क्रूड बेंचमार्क का योगदान रहता है। समय के साथ इसका अनुपात बदल सकता है।
कच्चे तेल की कीमतें आगे कैसे बढ़ सकती हैं?
तेल की कीमतों का भविष्य अनिश्चित है। संघर्ष कम होने और आपूर्ति बाधा घटने से कीमतें नीचे रह सकती हैं। वहीं, खाड़ी क्षेत्र में उत्पादन लंबे समय तक कम रहने पर बाजार में कमी आ सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं। गोल्डमैन सैश ने हाल ही में अनुमान लगाया है कि दिसंबर तक ब्रेंट क्रूड 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है।
बैंक ने यह भी कहा है कि खाड़ी क्षेत्र का उत्पादन 2025 के औसत से कम रहने पर 2027 में कीमतें काफी ऊंची हो सकती हैं। हालांकि, ये दीर्घकालीन अनुमान परिस्थितियों पर निर्भर हैं और इन्हें निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए।
भारत में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम कच्चे तेल की कीमतों के साथ तुरंत और समान अनुपात में नहीं बदलते। आयात लागत, कर, रुपये की विनिमय दर और तेल कंपनियों की मूल्य नीति उपभोक्ता कीमतों को प्रभावित करती है।
कुंजी बातें
- अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 9 फीसदी गिरावट आई।
- भारत के लिए तेल आयात लागत में कमी से सालाना 18,000 करोड़ रुपये तक की बचत संभव है।
- इंडियन क्रूड बास्केट भारत के तेल आयात की कीमतों का मुख्य सूचकांक है।
- तेल की कीमतों का अगला रुख खाड़ी क्षेत्र के उत्पादन और वैश्विक तनाव पर निर्भर करेगा।
स्रोत: deshbandhu.co.in


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