सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के अधिकारियों पर लगे आरोपों से जुड़े प्रवर्तन Directorate (ED) की याचिका की सुनवाई पूरी कर ली है। ED ने आरोप लगाया है कि कोलकाता में राजनीतिक सलाहकार कंपनी I-PAC के कार्यालय में जांच और तलाशी के दौरान ममता बनर्जी और राज्य के अधिकारियों ने उसकी जांच में बाधा डाली।
महत्वपूर्ण तथ्य
- सुनवाई जस्टिस पी. के. मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने की।
- ममता की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा कि राज्य सरकार खुद CBI को केस सौंप सकती है।
- ED ने कहा कि ममता ने सरकारी तंत्र का गलत इस्तेमाल किया।
- सुप्रीम कोर्ट ने डेमोक्रेसी खतरे में होने की बात कही थी।
- ED ने I-PAC के निदेशक को कोयला घोटाले में गिरफ्तार किया था।
कपिल सिब्बल की दलील
ममता बनर्जी की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अब पश्चिम बंगाल में सरकार बदल चुकी है और राज्य सरकार के पास मामले को CBI को सौंपने का अधिकार है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब राज्य सरकार खुद CBI जांच करवा सकती है, तो कोर्ट के आदेश की आवश्यकता क्यों है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि राज्य में सरकार तो बदल गई है, लेकिन ED सरकार नहीं चला रही है।
ED के आरोप और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
ED ने 23 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि ममता बनर्जी ने कोलकाता में I-PAC दफ्तर के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग जांच में बाधा डालने के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल किया। ED के मुताबिक तत्कालीन मुख्यमंत्री पुलिस के बड़े दल के साथ घटनास्थल पर पहुंचीं और जांच की कार्रवाई रोकवाई।
22 अप्रैल को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई मुख्यमंत्री जांच में दखल देता है, तो इससे लोकतंत्र को खतरा हो सकता है। ED ने इस मामले की जांच CBI को सौंपने की मांग की है ताकि स्वतंत्र जांच हो सके।
जानकारी के अनुसार, अप्रैल में ED ने कोयला घोटाले मामले में I-PAC के निदेशक को गिरफ्तार किया था।
स्रोत: indiatv.in


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