योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, यम और नियम के बिना अधूरा है योग साधना।
योग में यम और नियम की भूमिका
नई दिल्ली में कहा गया है कि आजकल लोग फिट रहने और तनाव कम करने के लिए योग को अपना रहे हैं, लेकिन योग का असली मतलब केवल आसन करना नहीं है। योग एक जीवनशैली है जो शरीर के साथ-साथ विचारों और व्यवहार को भी सुधारती है। योग दर्शन में यम और नियम को योग के शुरुआती दो अंग माना गया है, जो व्यक्ति के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन को अनुशासित बनाने में मदद करते हैं।
यम के पांच सिद्धांत
यम हमें दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह सिखाता है। इसके पांच मुख्य सिद्धांत हैं:
- अहिंसा – किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से चोट न पहुंचाना और दया का भाव रखना।
- सत्य – हमेशा सच बोलना और ईमानदारी बनाए रखना।
- अस्तेय – चोरी न करना, साथ ही किसी के अधिकार या समय का गलत उपयोग न करना।
- ब्रह्मचर्य – इंद्रियों पर नियंत्रण रखना और संयम बनाए रखना।
- अपरिग्रह – जरूरत से ज्यादा वस्तुएं न इकट्ठा करना और लालच से बचना।
नियम के पांच सिद्धांत
यम के बाद नियम आते हैं, जो अपने जीवन और आदतों को सुधारने की प्रेरणा देते हैं। इनके पांच प्रमुख सिद्धांत हैं:
- शौच – शरीर, मन और आस-पास के वातावरण को साफ-सुथरा रखना।
- संतोष – अपनी उपलब्धियों के प्रति आभार रखना और अनावश्यक इच्छाओं से बचना।
- स्वाध्याय – अच्छे ग्रंथों का अध्ययन करके सही ज्ञान प्राप्त करना।
- तप – अनुशासन, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना।
- ईश्वर प्रणिधान – अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना और विश्वास बनाए रखना।
स्रोत: deshbandhu.co.in


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